विश्व की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखला 'अरावली' की सुरम्य तलहटी में स्थित कांठा प्रान्त अपने आप में एक गौरवशाली इतिहास  को संजोये हुये है। यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से थार के दुरुह मरूस्थल व अरावली की गगन चुम्बी हरीभरी पर्वतमाला के मध्य सीमा रेखा के रुप में स्थित है।

 उत्तर में ब्यावर क्षेत्र  से लेकर दक्षिण में  गोडवाड़ व पूर्व में मेवाड़ से प्रारम्भ होकर पश्चिम में रोहट तक विस्तृत इस क्षेत्र का नाम कांठा प्रान्त पड़ने के पीछे भी कुछ रोचक तथ्य है। कहते हैं कि इस क्षेत्र में देशी बबूल (देशी बाबलिया) के वृक्ष अत्यधिक मात्रा में पाये जाते थे। जिससे इस क्षेत्र में सर्वत्र बबूल के कांटें  बिखरे रहते थे। इसी कारण क्रमान्तर में यह क्षेत्र 'काटों का प्रान्त' यानि 'कांठा प्रान्त' कहलाया।  कुछ किंवदन्तियों के अनुसार, जिस प्रकार साबरमती नदी के किनारों पर बसा क्षेत्र 'साबरकांठा' और बनास नदी के किनारों पर बसा क्षेत्र 'बनासकांठा'' कहलाता है, कांठा प्रान्त के ठीक मध्य से बहने वाली सुकड़ी नदी के दोनों किनारों पर बसे होने के कारण इस क्षेत्र का नाम 'कांठा' पड़ा।

थार के मरूस्थल से एकदम सटे होने के उपरान्त भी यह क्षेत्र हरा भरा व उपजाऊ होने के साथ ही साथ। सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी सुसमृद्ध है।

श्री कांठा प्रान्त ओसवाल साजना संघ  इन ५२ गांवों को अपने में समाविष्ट किये हुए है।

कांठा प्रान्त की स्थापना:

 सांगठनिक सुदृढ़ता की दृष्टि से इन ५२ गांवों की एक सिंह सभा (श्री कांठा प्रान्त ओसवाल साजना संघ)  का गठन पूज्य गुरुदेव १००८ श्री मरुधर केशरी श्री मीश्रीमलजी म. सा. की सद्प्रेरणा, निश्राय व आशीर्वाद से लगभग ८७ वर्ष पूर्व सम्वत् १९९५ (सन 1938) में  राणावास स्टेशन से 4 किलोमीटर दूर स्थित सिचाणा ग्राम में हुआ।

जिसमें निम्नांकित ५२ गांवों के दसा ओसवाल (छोटे साजना या लोडे साजना) परिवारों को एक इकाई के रूप में संघठित किया गया:

जवाली

सरला

गुड़ा केशरसिंह

सोजत सिटी

इटंदरा

कलाली

ईसाली

चण्डावल

ठाकुरला

सोमेसर

खारची

वासनी

सोमाजी का गुड़ा

मारवाड ज.

धरला

भादरलाऊ

बिठोडा

रामपुरा

भिवालिया

जोजावर

चिरपटिया

बुसी

दुर्गाजी का गुडा

रेंघडी

टेवाली

निम्बली

सिरियारी

सालड़िया

सोनाई

सारण

ठाकूरवास

सारणगो

पाली (कुछ परिवार)

वोपारी

राणावास

सियाट

रोहट

लाम्बिया

मलसाबावडी (राणावास स्टे.)

माण्डा

बगडी

रडावास

सेखावास

घटावर

खारडी

गुड़ा रामसिंह

सवराड

बराखण

सोजतरोड

पीपली एवं

हरियामाती

 

इस संगठन की स्थापना के साथ ही इसके सुसंचालन एवं एकब्द्धता  के लिये कुछ नियम व व्यवस्थायें निर्धारित की गयी।

सिंह सभा का द्वितीय अधिवेशन सम्वत् १९९७ (सन 1940) में राणावास में आयोजित हुआ। इसके २८ वर्ष के उपरान्त तृतीय अधिवेशन सम्बत् २०२६ (सन 1968)  अश्विन कृष्णा आमावस को राणावास में, चतुर्थ अधिवेशन सम्वत् २०२७ (सन 1969) अश्विन कृष्णा आमावस को बूसी में,  पंचम अधिवेशन सम्बत् २०२८ (सन 1970) फाल्गुन शुक्ला ११ को सिरियारी में व शष्टम् अधिवेशन सम्बत् २०३० (1972) मार्गशीष शुक्ला ५ को सोमेसर में व सप्तम अधिवेशन सम्वत् २०३३ (सन 1975) में पुनः सिरियारी में आयोजित हुआ।

पहले इस सामाजिक संघठन के लगभग सभी परिवार कांठा में ही निवास करते थे, पर कालान्तर में काठां प्रान्त के अधिकांश सदस्य परिवार अपने व्यापार, व्यवसाय के लिये गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि प्रान्तों में बस गये। जिससे इस क्षेत्र के निवासी सम्पूर्ण भारत और विश्व के अलग अलग कोनों में बिखर गये। भौगोलिक दूरी व उसके फलस्वरूप  नियमित सम्पर्क के अभाव में, साथही देशकाल की परिस्थितियों के वश समाज में कुछ शिथिलताओं का अनुभव किया जाने लगा

आशा आकांक्षाओं को नयी गति प्रदान हुई। राणावास में सम्वत् २०५२ ( सन 1994) अक्षय तृतीया के पावन प्ररंग पर परम पूज्य प्रवर्तक श्री रुपमुनिजी म. सा. रजत के सनिध्य में एक व्यापक समाज-सुधार कार्यक्रम की रुपरेखा बनी उसी के फलस्वरूप उनके प्रेरणा के अनुरुप व आशीर्वाद से श्री सिंह सभा का अष्टम् अधिवेशन १९ वर्ष बाद सम्बत् २०५२ (सन 1994) कार्तिक शुक्ला ५ को सिकन्द्राबाद में आयोजित हुआ। जिसमें संघ के पुनर्गठन का बीजारोपण हुआ व प्रारम्भिक रूप से कुछ नियमोपनियम बनाये गये। जिसका सर्वत्र स्वागत हुआ व पारित नियमोपनियमों की हृदय से अनुपालना की पावन भावना भी समाज में सर्वत्र परिलक्षित  हुई। सन 2002 में kantha. org के तत्वावधान में पहली बार संघ की वेबसाइट www.kanthaprant.org  बनाई गई। उसके बाद बहुत सी परिवार निर्देशिकायें और एड्रेस डायरियां भी प्रकाशित हई है।

इसी क्रम में एक और प्रयास के रूप में श्री कांठा प्रान्त ओसवाल साजना संघ बेंगलोर व कर्नाटक प्रान्त का एक संयुक्त अधिवेशन सम्बत् २०५२ (सन 1994)  आषाढ़ (द्वि) कृष्णा ७ को श्रीरामपुरम्, बेंगलोर में सम्पन्न हुआ। जिसमें प्रत्येक नगर में सुदृढ़ संगठन स्थापित हो ऐसा प्रयास किया गया।

इसके उपरांत बैंगलोर, चेन्नई, मुम्बई, हैदराबाद आदि शहरों में स्थानीय रूप से बहुत से संघठन बने जिनमें युवा संघठन विशेष उल्लेखनीय है। इन संघटनों के माध्यम से कांठा प्रान्त ओसवाल साजना संघ एक सुदृढ़ और संगठित संघ के रूप में उभर रहा है।

इसी कड़ी में कर्नाटक प्रांत के बैंगलोर के विजयनगर के कुछ युवाओं ने मिलकर २०२१ में एक संगठन का निर्माण किया

“ काँठा प्रांत विजयनगर मंडल “

इनकी बहुत सारी विशेषताओ में गुरु भगवंतों की विहार सेवा , खेल प्रतियोगिताएँ , मानव सेवा , जीव दया सेवा , इत्यादि है.

३३ सदस्यों की एक TEAM है , जिसमे आज भी कोई पद नहीं है , सब एक है.

काँठा प्रांत के इतिहास में पहली बार महिलाओं के लिए BOX CRICKET , और एक अंतर राजजिय BOX CRICKET , पुरुषों के लिए भी आयोजन किया गया जो बहुत तारीफ़े क़ाबिल है .

इन वर्षों में खेल प्रतियोगिताओं, दीपावली स्नेहमिलन, होली स्नेहमिलन, व्यावसायिक समारोहों के भी आयोजन निरन्तर अन्तराल पर हो रहे है। युवा संघटनों के द्वारा मानव कल्याण के बहुत ही महत्वाकांक्षी प्रकल्प भी चलाये जा रहे है।

साथ एक बहुत ही सुखद विषय यहां उल्लेख करने योग्य है कि कांठा प्रान्त के विभिन्न कार्यक्रमों और आयोजनों में युवा वर्ग की असीम रुचि और सक्रिय सहयोग परिलक्षित हुआ है, जो समाज के लिए एक शुभ एवं सुखद संकेत है।

वर्तमान में श्रीसंघ बहुत ही सम्पन्न हो गया है और अब जबकि पुनर्गठन का चक्र चल पड़ा है तो निश्चय ही इसे गति मिलेगी.